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Shubh Navratri 2013

Shubh Navratri 2013

happy_navratri_greetings11 अप्रैल 2013 के दिन से नव सम्वत्सर प्रारम्भ होगा| साथ ही इस दिन से
चैत्र शुक्ल पक्ष का पहला नवरात्रा होने के कारण इस दिन कलश स्थापना भी की जायेगी।नवरात्रे के नौ दिनों में माता के नौ रुपोंकी पूजा करने काविशेष विधि विधान है| साथ ही इन दिनों में जप-पाठ, व्रत- अनुष्ठान,यज्ञ-दानादि शुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुन्य फलों की प्राप्ति होती है.। नवरात्रों में देवी भक्त सकाम और निष्काम भाव से ‘दुर्गा सप्तशती का पाठ करते है ।  इस वर्ष में पहला नवरात्रा शुक्रवार के दिन अश्विनि नक्षत्र में प्रारम्भ होगा, तथा ये नवरात्रे 19 अप्रैल 2013 तक रहेगें|कुछ विद्वान 20 अप्रैल को सूर्योदय कालीन नवमी होने के कारण नवरात्र का समापन उस दिन मानते है ।

नवरात्र के बारे में रुद्रयामलतन्त्र  में कहा गया है कि ‘
नवशक्तिस्मायुक्ता नवरात्रं  तदुच्यते ‘ अर्थात नौ शक्तियों से युक्त होने के कारण इन्हें नवरात्र कहा जाता है ।पुरानो के अनुसार स्वंय देवी ने भगवान शंकर जी से कहा की जो भक्त नवरात्र पूजा भक्तिपूर्ण करते है,उनको में प्रसन्न होकर धन ,आरोग्य एवं उन्नति प्रदान करती हूँ । इस उपासना में वर्ण ,जाति इत्यादि का कोई भेद नहीं है ।

नवरात्रों के विषय में मान्यता है कि देवता भी मां भगवती की पूजा किया करते है| नवरात्रों में मां भगवती के नौ विभिन्न रुपों की पूजा की जाती है।  मां भगवती को शक्ति कहा गया है। . नवरात्रों में नौ दिन क्रमश
शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता,
कात्ययायनी, कालरात्रि, मां गौरी और सिद्धिदात्रि की पूजा की जाती है।
नवरात्रों में माता की पूजा करने के लिये मां भगवती की प्रतिमा के सामने किसी बडे बर्तन में रेत भरकर उसमें जौ उगने के लिये रखे जाते है।  इस के एक और पानी से भरा कलश स्थापित किया जाता है|कलश पर कच्चा नारियल रखा
जाता है।  कलश स्थापना के बाद मां भगवती की अंखंड ज्योति जगायी  जाती है|यह ज्योति पूरे नौ नवरात्रे दिन रात जलती रहनी चाहिए।यदि मां भगवती कीअंखंड ज्योति जगाने में असमर्थ है या अन्य कारणों से नहीं जगा सकते तो
सुबह शाम ज्योति जग कर आरती अवश्य करे । इसके अतिरिक्त निम्न मंत्र का भी जाप प्रतिदिन किया जा सकता है।

या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नम: ।।

नवारण मंत्र —ॐ एं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै   विच्चे ॥

भक्त जन इस दिन व्रत-उपवास तथा यज्ञ आदि का संकल्प लेकर माता की पूजा प्रारम्भ करते है|नवरात्रों में माता को प्रसन्न करने के लिये उपवास रखे जाते है| तथा रात्रि में माता दुर्गा के नाम का पाठ किया जाता है| इन
नौ दिनों में रात्रि में जागरण करने से भी विशेष शुभ फल प्राप्त होते है|

शुभ मुहूर्त में घट स्थापना–

1 1 अप्रैल 2 0 1 3  को (गुरूवार )को घट स्थापना होगी । घट स्थापना प्रातकाल दिव्सवभाव लग्न और अभिजीत महूर्त में  ही किये जाने का विधान है। अथवा सूर्य उदय मीन लग्न भी लिया जा सकता है ।

शुभ मुहूर्त – सुबह 9 :40 से 10 :20 तक

अभिजीत मुहर्त 11:58 से 12 :48

सभी धार्मिक तीर्थ स्थलों में इस दिन प्रात: सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त समय में घट स्थापना की जाती है| नवरात्रे के पहले दिन माता दुर्गा, श्री गणेश देव की पूजा की जाती है। सर्वप्रथम पूर्व या उतर की तरफ मुख करके रेशमी ,ऊनी या कुशा के आसन पर बैठे फिर पूजन आरम्भ करे । विदिवत पूजा के लिए पंडित या ब्राह्मण को आमंत्रित कर सकते है ।  इस दिन मिट्टी के बर्तन में रेत-मिट्टी डालकर जौ-गेहूं आदि बीज डालकर बोने के लिये रखे जाते है।कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है अत:सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापन के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की सुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगाजल से भूमि को लिपा जाता है. विधान के अनुसार इस स्थान पर सात प्रकार कीमिट्टी को मिलाकर एक पीठ तैयार किया जाता है, अगर सात स्थान की मिट्टीनहीं उपलब्ध हो तो नदी से लायी गयी मिट्टी में गंगोट यानी गांगा नदी की मिट्टी मिलाकर इस पर कलश स्थापित किया जा सकता है।

कलश में डालने की सामग्री —
कलश में सर्वप्रथम  जल भरे ,तत्पश्चात उसमें चन्दन ,सर्वोषधि ,दूब ,पंच
पप्लव ,कुश ,सुपारी ,सप्तमृत्तिका ,पंच रत्न ,दक्षिणा ,फिर वस्त्र रखे
,ढक्कन में चावल भरके उसके उपर रख दे । नारियल रखे ।

कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना

कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना देवी दुर्गा की प्रतिमा  पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है औरबायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है। हाथ में अक्षत -पुष्प लेकर दुर्गा माता का का आवाहन करे । फिर सूक्ष्मरूप में पंचामृत से पूजन करे ।

चुंकि भगवान शंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है।  अत:भगवान भोले नाथ की भी पूजा भी की जाती है। भक्त जन इस दिन व्रत-उपवास तथा यज्ञ आदि का संकल्प लेकर माता की पूजा प्रारम्भ करते है| नवरात्रों में
माता को प्रसन्न करने के लिये उपवास रखे जाते है| तथा रात्रि में माता दुर्गा के नाम का पाठ किया जाता है। इन नौ दिनों में रात्रि में जागरणकरने से भी विशेष शुभ फल प्राप्त होते है।

माता के नौ रुप
Nine Incarnation of Goddess

नवरात्रो में माता के नौ रुपों कि पूजा की जाती है. नौ देवीयों के नाम इस प्रकार है.

प्रथम-शैलपुत्री

दूसरी-ब्रह्मचारिणी,

तीसरी-चन्द्रघंटा,

चौथी-कुष्मांडा,

पांचवी-स्कंधमाता,

छठी-कात्यायिनी,

सातवीं-कालरात्री,

आठवीं-महागौरी,

नवमीं-सिद्धिदात्री.

नवरात्रों में माता के नो रूपों की पूजा विधि—–

प्रतिपदा तिथि माता के शैलपुत्री रुप की पूजा—
प्रतिपदा तिथि में पूजा प्रारम्भ कर  सबसे पहले भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है. उसके बाद श्री वरूण देव, श्री विष्णु देव की पूजा की जाती है| शिव, सूर्य, चन्द्रादि नवग्रह की पूजा भी की जाती है। उपरोक्त देवताओं कि पूजा करने के बाद मां भगवती की पूजा की जाती है. नवरात्रों के दौरान प्रतिदिन उपवास रख कर दुर्गा सप्तशती और देवी का पाठ किया जाता है|इन दिनों में इन पाठों का विशेष महत्व है. माता दुर्गा को अनेक नामों से जाना जाता है| उसे ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बलपर्दा, शुभ, निशुभं हरणी,महिषासुर मर्दनी, चंद-मुंड विनाशिनी, परमेश्वरी, ब्रह्मा, विष्णु और शिव
को वरदान देने वाली भी कहा जाता है। प्रथम पूजा के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है| इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है|
द्वितीया तिथि माता के ब्रह्माचारिणी रुप की पूजा—

द्वितीया तिथि के उपवास के दिन माता के दूसरे रुप देवी ब्रह्मचारिणी के रुप की उपासना की जाती है. माता ब्रह्माचारिणी का रुप उनके नाम के अनुसारही तपस्विनी जैसा है. एक मान्यता के अनुसार दुर्गा पूजा में नवरात्रे के
नौ दिनों तक देवी धरती पर रहती है. इन दिनों में साधना करन अत्यन्त उतम रहता है. माता ब्रह्माचारिणी को अरुहूल का फूल  और कमल बेहद प्रिय है. इन फूलों की माला माता को इस दिन पहनाई जाती है|

तृ्तीया तिथि माता के चन्द्राघंटा रुप की पूजा—

दूर्गा पूजा के तीसरे दिन माता के तीसरे रुप चन्द्रघंटा रुप की पूजा की जाती है| देवी चन्द्रघंटा सभी की बाधाओं, संकटों को दुर करने वाली माता है| सभी देवीयों में देवी चन्द्रघंटा को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्तियों की देवी कहा गया है|जो व्यक्ति इस देवी की श्रद्धा व भक्ति भाव सहित पूजा करता है. उसे माता का आशिर्वाद प्राप्त होता है|तृ्तीया तिथि के दिन माता चन्द्राघंटा की पूजा जिस स्थान पर की जाती है|वहां का वातावरण पवित्र ओर शुद्ध हो जाता है. वहां से सभी बाधाएं दुर होती है|

चतुर्थी तिथि माता के कुष्मांडा रुप की पूजा—–

देवी कुष्मांडा माता का चौथा रुप है| मास की चतुर्थी तिथि को माता के इसी रुप की पूजा की जाती है| देवी कुष्मांडा आंठ भुजाओं वाली है|इसलिये इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है| माता कुष्माण्डा के आंठवें हाथ में कमल फूल के बीजों की माला होती है| यह माला भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली कही गई है|पूर्ण श्रद्धा व विश्वास
के साथ जो जन माता के इस रुप की पूजा करते है| उन जनों के सभी प्रकार के कष्ट, रोग, शोक का नाश होता है|

पंचमी तिथि माता के स्कन्द देवी रुप की पूजा—-

पंचमी तिथि को माता स्कन्द देवी की पूजा की जाती है| नवरात्रे के पांचवे दिन कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा भी की जाती है| कुमार कार्तिकेय को ही स्कन्द कुमार के नाम से भी जाना जाता है| इसलिये इस दिन कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा आराधना करना शुभ कहा गया है|जो भक्त माता के इस स्वरुप की पूजा करते है, मां उसे अपने पुत्र के समान स्नेह करती है|देवी की कृ्पा से भक्तों की मुराद पूरी होती है. और घर में सुख, शान्ति व समृ्द्धि वृ्द्धि होती है|

षष्ठी तिथि माता के कात्यायनी देवी रुप की पूजा—–

माता का छठा रुप माता कात्यायनी के नाम से जाना जाता है|ऋषि कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण इनका नाम कात्यायनी पडा|माता कात्ययानी ने ही देवी अंबा के रुप में महिषासुर का वध किया था| नवरात्रे के छठे दिन इन्हीं की
पूजा कि जाती है|इनकी पूजा करने से भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है|निस्वार्थ भाव से माता की इस दिन पूजा करने से निर्बल भी बलवान बनता है|व भक्तजन को अपने शत्रुओ पर विजय प्राप्त होती है| इस माता की पूजा गोधूली बेला में की जाती है|

सप्तमी तिथि माता के कालरात्रि रुप की पूजा—-

तापसी गुणों स्वरुपा वाली मां कालरात्रि की पूजा की जाती है|माता के सांतवें रुप को माता कालरात्रि के नाम से जाना जाता है|देवी का यह रुप ऋद्धि व सिद्धि प्रदान करने वाला कहा गया है|यह तांत्रिक क्रियाएं करने वाले भक्तों के लिये विशेष कहा गया है| दुर्गा पूजा मे सप्तमी तिथि को काफी महत्व दिया गया है| इस दिन से भक्त जनों के लिये देवी मां के दरवाजे खुल जाते है|और भक्तों की भीड देवी के दर्शनों हेतू जुटने लगती है|

अष्टमी तिथि माता के महागौरी रुप की पूजा—

माता का आंठवा रुप माता महागौरी का है| एक पौराणिक कथा के अनुसार शुभ निशुम्भ से पराजित होने के बाद गंगा के तट पर देवता माता महागौरी की पूजाकर रहे थे, और राक्षसों से रक्षा करने की प्रार्थना कर रहे थे, इसके बाद
ही माता का यह रुप प्रकट हुआ और देवताओं की रक्षा हुई| इस माता के विषय में यह मान्यता है कि जो स्त्री माता के इस रुप की पूजा करती है, उस स्त्री का सुहाग सदैव बना रहता है| कुंवारी कन्या पूजा करें, तो उसे
योग्य वर की प्राप्ति होती है|साथ ही जो पुरुष माता के इस रुप की पूजाकरता है, उसका जीवन सुखमय रहता है|माता महागौरी अपने भक्तों को अक्षय आनन्द ओर तेज प्रदान करती है|

नवमी तिथि माता के सिद्धिदात्री रुप की पूजा—

भक्तों का कल्याण करने के लिये माता नौ रुपों में प्रकट हुई| इन नौ रुपों में से नवम रुप माता सिद्धिदात्री का है| यह देवी अपने भक्तोम को सारे जगत की रिद्धि सिद्धि प्रदान करती है|माता के इन नौ रुपों की न केवल मनुष्य बल्कि देवता, ऋषि, मुनि, सुर, असुर, नाग सभी उनके आराधक है|माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों के रोग, संताप व ग्रह बधाओं को दुर करने वाली कही गई है|

घर में पूजन  समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
इस प्रकार नवरात्रों के नौ दिनों में माता के अलग अलग रुपों की पूजा की जाती है|नवरात्रों का व्रत करने वाले उपवासक को दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए|मांस, मदिरा का त्याग करना चाहिए|इसके अतिरिक्त नवरात्रों में बाल कटवाना, नाखून काटना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिए|ब्रह्मचार्य का पूर्णत: पालन करना चाहिए| नवरात्रे की अष्टमी या नवमी के दिन दस साल से कम उम्र की नौ कन्याओं और एक लडके को भोजन करा कर साथ ही दक्षिणा देनी चाहिए|लडके को भैरव का रुप माना जाता है| कंजनों को भोजन करवाने से एक दिन पूर्व रात्रि को हवन कराना विशेष शुभ माना जाता है| कंजकों को भोजन करवाने के बाद उगे हुए जौ और रेत को जल में विसर्जित कर दिया जाता है|कुछ जौं को जड सहित उखाडकर समृ्द्धि हेतू घर की तिजौरी या धन रखने के स्थान पर रखना चाहिए|कलश के पानी को पूरे घर में छिडक देना चाहिए| इससे घर से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है| और नारियल को माता दुर्गा के प्रसाद स्वरुप खा लिया जाता है|इस बात का विशेष ध्यान रहे कि पूजा शांति पूर्ण ढंग से की जानी चाहिए। किसी भी प्रकार की जल्दबाजी न करें।

“मम महामाया भगवती प्रीतये आयुर्बलावित्तारोग्य समादरा हि प्राप्तये नवरात्र व्रतमहं करिष्य”

Read in English : –    http://www.bhrigumantra.com/navratri-durga-pooja/

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