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DHANTERAS MUHURAT 2013

DHANTERAS MUHURAT 2013

HAPPY DHANTERAS TO ALL

Dhanteras or Dhantrayodashi is the first day of Diwali celebration. “Dhan” stands for wealth and teras signify thirteenth day. So Dhanteras is celebrated on trayodashi of Kartik Krishna Paksha. This year i.e. Dhanteras 2013will be celebrated on Friday, 01st November.

Prime Traditions of Dhanteras
Purchasing gold or silver coins (or at least one or two new utensils) on Dhanteras, is said to bring prosperity.

Dhanteras is ideal time to start new businesses, new projects, housewarming, buying vehicles or electronic items.
Worship Lord Dhanvantri to stay healthy.
Worship Kuber – The treasurer of the gods.
Worship your Tijoori (Safe where you keep money and jewellery) as a symbol of Lord Kuber.
Chant Kuber Mantra to please him.

Best Muhurat for Dhanteras puja 2013
Evening 6:20pm to 08:10pm will be the best and most auspicious Dhanteras puja muhurat on 1st November 2013.

Dhanteras – Puja Rituals & Celebrations
Decorate your home and business premises.
Businessmen should close their yearly accounts, worship account books and silver coins.
Yamdeep – Lamps are kept burning all through the nights near Tulsi plant.
Worship Lord Yama and Lord Dhanvantri, to prevent untimely death.
Sign Aarti of Lord Dhanvantri and please him.
Prepare sweet and other food items for Diwali celebration.
Make colourful Rangoli and tie toraan on the entrance to welcome Maa Lakshmi.
Mark small footprints with rice flour and Kumkum.
In Maharashtra Jaggery mixed with semi crushed dry coriander seeds are offer as Naivedya.
Farmers should worship cattle specially cows, as they are considered as incarnation of Goddess Lakshmi.
Worship Kuber – The treasurer of the gods.

Worship your Tijoori (Safe where you keep money and jewellery) as a symbol of Lord Kuber.
Chant Kuber Mantra to please him.

धनतेरस 1 नवम्बर,
धनतेरस : अमृत योग में खरीदी का महामुहूर्त
14 साल बाद विशेष संयोग में होगी धन्वंतरी जयंती

हिन्दू धर्म में धनवंतरी देवताओं के वैद्य माने गए हैं। धनवंतरी महान चिकित्सक थे। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार धनवंतरी भगवान विष्णु के अवतार समझे गए हैं। समुद्र मंथन के दौरान धनवंतरी का पृथ्वी लोक में अवतरण हुआ था।

शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी, चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिए दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धनवंतरी का जन्म धनतेरस के रूप में मनाया जाता है।

भगवाण धनवंतरी को प्रसन्न करने का अत्यंत सरल मंत्र है:

ॐ धन्वंतरये नमः॥

धनवंतरी देव का पौराणिक मंत्र
धनवंतरी के मंत्र, धनतेरस के मंत्र
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

अर्थात् परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धनवंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिए हैं, सर्व भयनाशक हैं, सर्व रोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धनवंतरी को सादर नमन है।

कुबेर मंत्र से करें धनतेरस का पूजन

समस्त धन सम्पदा और ऐश्वर्य के स्वामी कुबेर के लिए धनतेरस के दिन शाम को 13 दीप समर्पित किए जाते हैं। कुबेर भूगर्भ के स्वामी हैं। कुबेर की पूजा से मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा जागृत होती है और धन अर्जन का मार्ग प्रशस्त होता है।

निम्न मंत्र द्वारा चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें-

कुबेर मंत्र :

‘यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि में देहि दापय स्वाहा।’
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पुष्य नक्षत्र के बाद खरीदी का दूसरा महामुहूर्त धनतेरस यानी दिवाली के 2 दिन पहले 1 नवंबर को होगा। इस बार 14 साल बाद धनतेरस पर अमृत योग बनेगा। इस खास संयोग में भगवान धन्वंतरी का प्राकट्य दिवस मनाया जाएगा।

शुक्रवार लक्ष्मी का प्राकट्य दिन होता है। चंद्रमा के हस्त नक्षत्र में होने से 1 नवंबर को धन त्रयोदशी के दिन अमृत योग बन रहा है। यह संयोग 14 साल पहले 5 नवंबर 1999 को बना था।

इस दिन शाम 6.40 से 8.20 बजे तक महाप्रदोषकाल रहेगा। इस दौरान यम की प्रसन्नता के लिए दीपदान किया जाता है। इस दिन सोने-चांदी और बर्तन की खरीदी का विशेष महत्व है।

दुकान, मकान, गहने, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की खरीदी स्थायी फल प्रदान करती है। इस दिन कर्ज और उधार नहीं देने की परंपरा है।
संबंधित जानकारी
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धनवंतरी का जन्म हुआ था, इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धनवंतरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था।

भगवान धनवंतरी चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परंपरा है। अत: कोई भी नया बर्तन अवश्य खरीदें, ऐसा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।

इस दिन धनवंतरी जी का पूजन इस तरह करें – नवीन झाडू एवं सूपड़ा खरीदकर उनका पूजन करें।

सायंकाल दीपक प्रज्ज्वलित कर घर, दुकान आदि को सुसज्जित करें।
मंदिर, गौशाला, नदी के घाट, कुओं, तालाब, बगीचों में भी दीपक लगाएं।यथाशक्ति तांबे, पीतल, चांदी के गृह-उपयोगी नवीन बर्तन व आभूषण क्रय करें।
कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुआं, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाएं।

शुभ मुहूर्त में अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान में नई गद्दी बिछाएं अथवा पुरानी गद्दी को ही साफ कर पुन: स्थापित करें।

धनवंतरी जी की पूजा से तात्पर्य आसपास के वातावरण की सफाई से है। समूह में दीपक जलाने से तापमान बढ़ता है, जिससे सूक्ष्म कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और प्रकृति स्वरूपा साक्षात् लक्ष्मी के आगमन का मार्ग प्रशस्त होता है।

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