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गुरुपूर्णिमा महोत्सव

गुरुपूर्णिमा महोत्सव

देश भर में गुरुपूर्णिमा महोत्सव 12 जुलाई को मनाया जाएगा।

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु से मंत्र लेकर वेदों का पठन करने वाला शिष्य ही साधना की योग्यता पाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए इस श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। व्यावहारिक जीवन में भी देखने को मिलता है कि बिना गुरु के मार्गदर्शन या सहायता के किसी कार्य या परीक्षा में सफलता कठिन हो जाती है। लेकिन गुरु मिलते ही लक्ष्य आसान हो जाता है। गुरु ऐसी युक्ति बता देते हैं, जिससे सभी काम आसान हो जाते हैं। गुरु का मार्गदर्शन किसी ताले की चाभी की तरह है। इस प्रकार गुरु शक्ति का ही रूप है।
भारत भर में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को भगवान विष्णु, महर्षि वेद व्यास की पूजा-अर्चना और अपने इष्ट गुरु की आराधना का विधान है। है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे। वैसे तो देश भर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उनमें महर्षि वेद व्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे,व्यास पूर्णिमा महर्षि व्यास की अद्भुत शक्ति, कृपा और मानवीय प्रज्ञा की स्मृति में मनाई जाती है। पुराणों में एक प्रसंग मिलता है कि जिसके अनुसार संतों, ऋषियों और देवताओं ने महर्षि व्यास से अनुरोध किया था कि जिस तरह सभी देवी-देवताओं की पूजा के लिए कोई न कोई दिन निर्धारित है उसी तरह गुरुओं और महापुरुषों की अर्चना के लिए भी एक दिन निश्चित होना चाहिए। इससे सभी शिष्य और साधक अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता दर्शा सकेंगे। इस अनुरोध पर वेद व्यास ने आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन से ‘ब्रह्मासूत्र’ की रचना शुरू की और तभी से इस दिन को व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा।
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु वह है, जिसमें आकर्षण हो, जिसके आभा मंडल में हम स्वयं को खिंचते हुए महसूस करते हैं। जितना ज्यादा हम गुरु की ओर आकर्षित होते हैं, उतनी ही ज्यादा स्वाधीनता हमें मिलती जाती है। कबीर, नानक, बुद्ध का स्मरण ऐसी ही विचित्र अनुभूति का अहसास दिलाता है। गुरु के प्रति समर्पण भाव का मतलब दासता से नहीं, बल्कि इससे मुक्ति का भाव जागृत होता है। गुरु के मध्यस्थ बनते ही हम आत्मज्ञान पाने लायक बनते हैं। सच्चा गुरु स्वयं को कभी थोपता नहीं है। वह अपने व्यवहार हमारे सामने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करता है जिससे हम वैसा व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान देने के साथ-साथ जीवन में अनुशासन में जीने की कला भी सिखाते हैं। वह व्यक्ति में सत्कर्म और सद्विचार भर देते हैं। इसलिए गुरु पूणिर्मा को अनुशासन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। गुरु हमारे अंदर संस्कार का सृजन, गुणों का संवर्धन और वासनाओं एवं हीन गंथियों का विनाश करते हैं। पुराणों में दिए प्रसंग यह संदेश भी देते हैं कि अगर मन में लगन हो तो कोई भी व्यक्ति गुरु को कहीं भी पा सकता है। एकलव्य ने मिट्टी की मूर्ति में गुरु को ढूंढ लिया और महान धनुर्धर बन गया। जगत गुरु दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए थे। उन्होंने दुनिया में मौजूद हर उस वनस्पति, प्राणी और ग्रह-नक्षत्र को अपना गुरु माना, जिसकी प्रकृति और गुणों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उन्होंने पृथ्वी से क्षमा और निस्स्वार्थ भाव, वायु से दूसरे के प्राणों की रक्षा, आकाश से सीमित में असीमित दिखना, समुद से किसी भी परिस्थिति में एक जैसा रहना, जल से पालन-पोषण की भावना और अग्नि से शुद्धता का भाव सीखा।
यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं। गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है। इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है। आज गुरु-शिष्य में भक्ति का अभाव गुरु का धर्म ‘‘शिष्य को लूटना, येन केन प्रकारेण धनार्जन है’’ क्योंकि धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए धनतृष्णा कालनेमि गुरुओं को गुरुता से पतित करता है। यही कारण है कि विद्या का लक्ष्य ‘मोक्ष’ न होकर धनार्जन है। ऐसे में श्रद्धा का अभाव स्वाभाविक है। आज व्यासत्व यानी गुरुत्व अर्थात् संपादकत्व का उत्थान परमावश्यक है।।।

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