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Blog about Astrology

Sharad Purnima 2016 Sharad Purnima 2016

Sharad Purnima 2016

शरद पूर्णिमा ( कोजागिरी) :
*15 अक्टूबर 2016 – शरद पूनम की रात दिलाये- आत्मशांति, स्वास्थ्यलाभ।*
आश्विन पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ या कोजागिरी भी बोलते हैं । इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था । अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है । इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है ।

*शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?*
दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें ।
अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना ।
*इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से भी नेत्रज्योति बढ़ती है ।*
*शरद पूनम दमे की बीमारीवालों के लिए वरदान का दिन है।*
छोटी इलाईची को, चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं । दमे का दम निकल जायेगा ।
चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है । शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है।

अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में नयापन आता है।
*खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद*
खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे।
खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धो-धा के खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा।
इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे ।
रात्रि 8 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 11 बजे के आसपास भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना और खाने से पहले एकाध चम्मच ईश्वर के हवाले भी कर देना । मुँह अपना खोलना और भाव करना : ‘लो प्रभु ! आप भी लगाओ भोग ।’ और थोड़ी बच जाय तो फ्रिज में रख देना । सुबह गर्म करके खा सकते हो ।

(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी – इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती ।)
*शरद पूनम का आत्मकल्याणकारी संदेश*
रासलीला इन्द्रियों और मन में विचरण करनेवालों के लिए अत्यंत उपयोगी है लेकिन राग, ताल, भजन का फल है भगवान में विश्रांति । रासलीला के बाद गोपियों को भी भगवान ने विश्रांति में पहुँचाया था । श्रीकृष्ण भी इसी विश्रांति में तृप्त रहने की कला जानते थे । संतुष्टि और तृप्ति सभीकी माँग है । चन्द्रमा की चाँदनी में खीर पड़ी-पड़ी पुष्ट हो और आप परमात्म-चाँदनी में विश्रांति पाओ ।

चन्द्रमा के दर्शन करते जाना और भावना करना कि ‘चन्द्रमा के रूप में साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा की रसमय, पुष्टिदायक रश्मियाँ आ रही हैं । हम उसमें विश्रांति पा रहे हैं । पावन हो रहा है मन, पुष्ट हो रहा है तन, ॐ शांति… ॐ आनंद…’ पहले होंठों से, फिर हृदय से जप और शांति… निःसंकल्प ईश्वर में विश्रांति पाते जाना । परमात्म-विश्रांति, परमात्म-ज्ञान के बिना भौतिक सुख-सुविधाएँ कितनी भी मिल जायें लेकिन जीवात्मा की प्यास नहीं बुझेगी, तपन नहीं मिटेगी ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ । (रामायण)

Sarv Pitra Amavasya ke Upay Sarv Pitra Amavasya ke Upay

Sarv Pitra Amavasya ke Upay

सर्वपितृ अमावस्या पर उपाय

आत्मा की अमरता के सिद्धांत को स्वयं भगवान श्रीकृषण गीता में वर्णन करते हैं! आत्मा जबतक अपने परमात्मा से संयोग नहीं कर लेती तब तक विभिन्न संभवत: 84 लाख योनियों में भटकती रहती है और इस मध्य उसे श्राद्ध कर्म से संतुष्टि मिलती है! श्राद्ध – श्रद्धा का दूसरा नाम है ! श्राद्ध कर्म के विषय में अपस्तंब ऋषि कहते हैं कि जैसे यज्ञ – हवन – होम के माध्यम से देवताओं को उनका भाग और शक्ति प्राप्त होती है, उसी प्रकार श्राद्ध और तर्पण से पितृ लोक में बेठे पितरों को उनका अंश प्राप्त होता है! “समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।”
“सर्व पितृ अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं।

अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि पितृजनों के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं इस कार्य में प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्ही पितरों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करने का अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिए विद्वान को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
हिन्दू पंचांग के आश्विन माह के कृष्णपक्ष यानि श्राद्धपक्ष में पितरों की प्रसन्नता के लिए अंतिम अवसर सर्वपितृ अमावस्या माना जाता है। यह तिथि इस बार “30-9-2016” को आएगी। कोई श्राद्ध का अधिकारी पितृपक्ष की सभी तिथियों पर पितरों का श्राद्ध या तर्पण चूक जाएं या पितरों की तिथि याद न हो तब इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। इसलिए यह पितृमोक्ष अमावस्या या सर्वपितृ अमावस्या के नाम से प्रसिद्ध है।
जिन दंपत्तियों के यहां ३ पुत्रियों के बाद एक पुत्र जन्म लेता है या जुड़वां संतान पैदा होती है। उनको सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध जरुर करना चाहिए।
सर्वपित् अमावस्या को पितरों के श्राद्ध से सौभाग्य और स्वास्थ्य प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस तिथि पर पितृ आत्मा अपने परिजनों के पास वायु रुप में ब्राह्मणों के साथ आते हैं। उनकी संतुष्टि पर पितर भी प्रसन्न होते हैं। परिजनों के श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से वह तृप्त और प्रसन्न होकर आशीर्वाद देकर जाते हैं, किंतु उनकी उपेक्षा से दु:खी होने पर श्राद्धकर्ता का जीवन भी कष्टों से बाधित होता है।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों की तृप्ति से परिवार में खुशियां लाने का श्राद्धपक्ष का अंतिम अवसर न चूक जाएं। इसलिए यहां बताए जा रहे हैं कुछ उपाय जिनका अपनाने से भी आप पितरों की तृप्ति कर सकते हैं-
कुंडली में चल रहे कालसर्प दोष से मुक्ति भी इन उपायों द्वारा संभव है कालसर्प दोष की मुक्ति के लिए भी इन उपायों को कर सकते हैं.
सर्वपितृ अमावस्या को पीपल के पेड़ के नीचे पुड़ी, आलू व इमरती या काला गुलाब जामुन रखें।
पेड़ के नीचे धूप-दीप जलाएं व अपने कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करें। पितरों का ध्यान कर नमस्कार करें। ऐसा करने पर आप जीवन में खुशियां व अनपेक्षित बदलाव जरुर देखेंगे।
इस दिन पांच फल गाय को खिलाएं।
पितरों के निमित्त धूप देकर इस दिन तैयार भोजन में से पांच ग्रास गाय, कुत्ता, कौवा, देवता और चींटी या मछली के लिए जरुर निकालें और खिलाएं।
यथाशक्ति ब्राह्मण को भोजन कराएं। वस्त्र, दक्षिणा दें। जब ब्राह्मण जाने लगे तो उनके चरण छुएं, आशीर्वाद लें और उनके पीछे आठ कदम चलें।

अगर श्राद्ध करने वाले की साधारण आय हो तो वह पितरों के श्राद्ध में केवल एक ब्राह्मण को भोजन कराए या भोजन सामग्री जिसमें आटा, फल, गुड़, शक्कर, सब्जी और दक्षिणा दान करें। इससे पितृ दोष का प्रभाव कम होता है।

ब्राह्मण के भोजन के लिए आने से पहले धूपबत्ती अवश्य जलाएं। विद्वान ब्राह्मण को एक मुट्ठी काले तिल दान करने मात्र से भी पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।

इतना भी संभव न हो तो सूर्यदेव को हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि मैं श्राद्ध के लिए जरूरी धन और साधन न होने से पितरों का श्राद्ध करने में असमर्थ हूं। इसलिए आप मेरे पितरों तक मेरा भावनाओं और प्रेम से भरा प्रणाम पहुंचाएं और उन्हें तृप्त करें।

सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें, उसके बाद सूर्य भगवान के सामने जल और अन्न ले जाकर प्रार्थना करें कि:
” हे सूर्यदेव, यमराज आप के पुत्र हैं, हमारे घर के जो भी गुजर गये उन सभी पित्र स्वरूप देव की आत्मा को शांति प्रदान करें, आज किए गए श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ का पुण्य हमारे पित्र देव को प्रदान करें ” इस प्रकार कहते हुए तीन बार जल में काले तिल मिलाकर सूर्य देव के सामने मुंह कर कर तीन बार तिलांजलि अर्पित करें.
पितृ गण इस उपाय से राजी होंगे, और पितरों के आशीर्वाद से परिवार में अच्छी संतान जन्म लेगी, घर में आने वाली अनचाही परेशानियों से मुक्ति मिलेगी , कामकाज एवं धन-समृद्धि में वृद्धि होगी,
इस तरह सर्वपितृ अमावस्या को श्रद्धा से पूर्वजों का ध्यान, पूजा-पाठ, तर्पण कर पितृदोष और कालसर्प दोष के कारण आने वाले कष्ट और दुर्भाग्य को दूर करें। इस दिन को पितरों की प्रसन्नता से वरदान बनाकर मंगलमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

Ekadashi Vrat 2016 Ekadashi Vrat 2016

Ekadashi Vrat 2016

निर्जला एकादशी व्रत – (16 जून 2016- गुरुवार) Ekadashi Vrat

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है। इस एकादशी को भीम एकादशी भी कहा जाता है। जल का सेवन किए बिना उपवास करने से इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस व्रत मे पानी का पीना वर्जित है, इसिलिये इसे निर्जला एकादशी कहते है। इस दिन सुबह से शाम तक दान-पुण्य का दौर चलता है। निर्जला एकादशी के मौके पर लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर सहित शहर के सभी मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान होते है। तथा निर्जला एकादशी पर धर्मार्थियों द्वारा जगह-जगह सेवा शिविर लगाये जाते है, जिसमें शीतल पेयजल, छाछ, फल आदि से लोगों को मनुहार करते है। इस दिन ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करके गौदान, वस्त्रदान, छत्र, फल आदि दान करना चाहिए। इस दिन शक्कर युक्त जल का घडा भर कर आम, खरबूजा के साथ बीजणी मंदिर में रखने या ब्राह्मण को दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी करने का समय :-

निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के दौरान किया जाता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मई अथवा जून के महीने में होता है। साधारणतः निर्जला एकादशी का व्रत गँगा दशहरा के अगले दिन पड़ता है, परन्तु कभी-कभी साल में गँगा दशहरा और निर्जला एकादशी दोनों एक ही दिन पड़ जाते हैं।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारणा कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारणा किया जाता है। एकादशी व्रत का पारणा द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारणा सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारणा न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारणा हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं, उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारणा करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मध्यान के बाद पारणा करना चाहिए।

कभी-कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है, तब स्मार्थ-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उंगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें। इस दिन यथाशक्ति दान करना चाहिए। किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि कदापि ग्रहण न करें। दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है। वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए। त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें। प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणा देना चाहिए।

निर्जला एकादशी से लाभ :-

जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है। उन्हें केवल निर्जला एकादशी का उपवास करना चाहिए, क्योंकि निर्जला एकादशी का उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।

निर्जला एकादशी से सम्बन्धित पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी और भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में दूसरा भाई भीमसेन खाने-पीने का अत्यधिक शौक़ीन था और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं था इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाता था। भीम के अलावा बाकि पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान था। भीमसेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहा है। इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गया, तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने की सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। जो मनुष्य़ निर्जला एकादशी का व्रत करता है उनको मृत्यु के समय मानसिक और शारीरिक कष्ट नही होता है। इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति स्नान, तप और दान करता है, उसे करोड़ों गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है।

Significance of Akshaya Tritiya Significance of Akshaya Tritiya

Significance of Akshaya Tritiya

As per Hindu calendar, Akshaya Tritiya (अक्षय तृतीया) is celebrated on third day of bright moon (Shukla paksha) of Vaishakha / Baisakh month.
Akshaya Tritiya (अक्षय तृतीया) in 2016 will be observed on Monday, 9th May.

Akshaya Tritiya , also known as ‘Akha Teej’, is the most auspicious day in Hindu community of India. Akshaya Tritiya day is ruled by God Vishnu who is the preserver God in the Hindu Trinity. According to Hindu mythology Treta Yuga began on Akshaya Tritiya day.

• The day also marks the birth anniversary ‘Lord Parasurama’, who is the sixth incarnation of Lord Vishnu. The Puranic scriptures speak about how he reclaimed the land from the sea.

• In Hinduism, Akshay Tritiya was the day when Vyasa started writing the history of the great Bharat war in the form of an epic Mahabharata.

• The most sacred river of India, descended to the earth from the heaven.

• It was on this day that Goddess Annapurna Devi was born.

• It is on this day that poor Sudama, the best friend of Krishna visits Him (Lord Krishna) to greet Him after He became the King. With nothing to offer, Sudama takes with him Poha (puffed rice) and offers it to his friend and never discusses his poverty though he intends to. On his return he finds his hut changed to a palace.

• Kubera received his wealth and position as custodian of wealth and property with Goddess Lakshmi on this day, by praying to Lord Shiva at Shivapuram.

• In more recent history, Adi Shankara recited the Kanaka Dhara Stotr on this day for the sake of the poor couple at whose house he stopped for Bhiksha and was offered their only available gooseberry.

Akshaya Tritiya is considered as the most golden day of the year because the word Akshaya means the most “Eternal” that which never diminishes. Any initiative made on that day or anything bought on that day is considered to be good fortune. The most popular activity is the buying of gold and it is believed it will be a sign of good fortune for the buyer. Most people purchase Gold on this day as it is believed that buying Gold on Akshaya Tritiya brings prosperity and more wealth in coming future. Being Akshaya day it is believed that Gold, bought on this day, will never diminish and would continue to grow or appreciate. In the Indian culture people typically starts a new business or begins a new venture on Akshaya Tritiya. This is also one of the most popular days for weddings to take plans as the spirit of this day bids them on a very long and fulfilling life journey. It was also believed that people born in that month will be very lucky and will shine bright throughout their life. This day is generally observed by fasting and worship of Lord Vasudeva with rice grains. A dip in the river Ganges on this day is considered to be very auspicious. Fasts are kept on this day and pujas are performed. In charity, fan, rice, salt, ghee, sugar, vegetables, tamarind, fruit, clothes, are given. The god Vishnu is worshiped. Tulsi water is sprinkled in the nearby area of the idol while performing aarti. When anyone makes donation for food to poor on this day, the divine Mother Annapurna gives her blessings.
Followers of Jainism consider Akshaya Tritiiya to be a holy and supremely auspicious day. It is associated with Lord Adinatha, also known as Rishabhadeva, first of the twenty-four Tirthankaras. On this day people who observe the year-long alternative day fasting known as Varshi-tap finish their Tapasya by doing parana by drinking sugarcane juice.
Akshaya Tritiya is believed to bring good luck and success.

     “May this day of Akshaya Tritiya
Bring you good luck and prosperity
That never diminishes.”

Rama Navami celebrations Rama Navami celebrations

Rama Navami celebrations

Ram Navami is a religious and traditional festival, celebrated every year with great enthusiasm by the people of Hindu religion. The festival of Ram Navami is celebrated as the birthday of the Hindu God Rama, who is believed to be one of the incarnations of Lord Vishnu. Hindu religion believes that Rama was born to destroy the signs of evil from the earth and to eliminate negativity from life. Lord Vishnu made promise to protect the deities of the Heaven from the tyranny of Ravana, the demon. The Lord kept his promise in the form of a human being namely Rama. Later, people’s devotion towards Rama transformed him into a deity and since then he became known as Lord Rama.
As per the Hindu religion, Rama is the symbol of the perfect man or Lord of Self Control or Lord of Virtue. Lord Rama truly represents the virtues like sacrifice, indomitable courage, honesty and strength. He executed the murder of Ravana without losing his cool even in most difficult situations that he faced during the course of the time.
According to the Hindu calendar, it falls on the ninth day of the Chaitra month, which is the spring season. Though Ram Navami is a major festival which celebrates birth of Lord Rama .Hindu people celebrates it as a 9 days festival by organizing the Akhand Paath of the Ramacharitamanas, religious bhajan, havan, ritual kirtan and distribution of Prasad after the puja and Aarti at 9th day. Devotees make the statue of the Lord Rama in infant form and make prayer in front of the God. It is considered auspicious to undertake a fast on the day of Ram Navami, in the name of Rama. The objective of the fast is not to ask for special favors of the deity, but to seek perfection as a human being. Devotees perform elaborate pujas and chant the name of Rama for whole day. Temples of Rama are specially decorated and satsangs and bhajan sessions are organized in most of the temples, through the day. Discourse on the Ramayana, are recited by a pundit or a professional story-teller on this day. At some places of India, it usually lasts nine days, beginning on Ugadi and ending on Rama Navami. Thus, people of India celebrate Ram Navami with great joy and devotion. Sacred places associated with Rama, like Ayodhya, Ujjain and Rameshwaram, draw thousands of devotees on this festival of Ram Navami. In Rameshwaram, people take a ritual bath in the sea before worshipping at the Ramanathaswamy temple. Many places in North India host fairs in connection with the festival, culminating in spectacular fireworks on Rama Navami. During Rama Navami Hanuman is worshipped for his unflinching devotion to Rama and his worship forms an important part of the Rama Navami celebrations.
As we celebrate this holiday, as we revel in Bhagwan Rama’s birth, let us ask ourselve ;When one is under the sway of the ahamkaras, the power of discrimination between right and wrong is destroyed. Consequently the Lord’s light has to descend on him to destroy these ahamkaras.

Diwali Pujan Muhurat – Nov 11, 2015 Diwali Pujan Muhurat – Nov 11, 2015

Diwali Pujan Muhurat – Nov 11, 2015

Deepawali or Diwali is a festival of lights symbolizing the victory of righteousness and the lifting of spiritual darkness. The word “Deepawali” refers to rows of Diya’s or Clay Lamps. This is one of the most popular festivals in the Hindu calendar. Hence the Diwali Festival is also called the “Festival of Lights”.

Diwali is not just a day; it’s actually the platter of entertainment, zeal, enthusiasm, celebrated over a period of five days. Diwali is considered to be the most important festival for the Hindus. It is celebrated on the 15th day of Kartika, according to the Hindu calendar. This festival commemorates Lord Rama’s return to his kingdom Ayodhya after completing his 14-year exile. The myths around Rama and Ravana are told during another holiday, known as Dussehra or Vijaya Dashami.
2015, In Diwali starts with Dhanteras on November 9.

Each day of the festival has a different meaning. The main festivities take place on the third day (this year, on November 11), while the the fourth day is celebrated as New Year’s Day. Merchants open fresh accounts for the New Year, and offer prayers. On the fifth and last day, brothers and sisters get together and share food, to honor the bond between them.

The candlelight makes Diwali a very warm and atmospheric festival, and it’s observed with much joy and happiness.
Diwali celebrations may last for up to five days. Many people decorate their home and workplaces with tiny electric lights or small clay oil lamps. Bowls of water with candles and flowers floating on the surface are also popular decorations.
Many people make a special effort to clean their homes and yards before Diwali. They may also wash themselves with water and fragrant oils, wear new clothes and give gifts of sweets to family members, close friends and business associates. Fireworks are set off in the evening in some areas. Melas (fairs) are held in many towns and villages. However, be prepared for lots of loud noise from the fireworks and firecrackers going off. The air also becomes filled with smoke from the firecrackers, which can add to breathing difficulties.
Diwali is a festival over five days, Called also Panch Parav. Diwali celebrations may last for up to five days. Many people decorate their home and workplaces with tiny electric lights or small clay oil lamps. Bowls of water with candles and flowers floating on the surface are also popular decorations.

First day is Dhanteras
People pray to Goddess Lakshmi for prosperity and wealth. People buy gold articles and new goods and the Symbols of Lakshmi on this day.

Second day is Choti Diwali
Also known as Naraka Chaturdashi or kali Chaudas in some states legend, that The Lord Krishna and his wife Satyabhama killed the evil daemon Narakasura on this day.

Third day is Diwali
Many people go to their Temples for worshiping Laksmi, Goddess of wealth and also pray to Ganesha and Offered to the deities, praising the deity by sinning Arty songs. At Night people light up little oil lamps called diyas, dipak, and placed them around their houses. And enjoying fire work or blasting firecrackers.

The Fourth Day is Padwa
Kartika first in Hindu calendar and also known as Govardhan pooja or Annakoot.It is said that Krishna defeated the God of rain and heaven Indra on that day. He lifted Mount Goverdhana to save people’s life from the floods and heavy Rain. According to another legend, Vishnu defeated the demon-king Bali on this day. Bali was allowed to return to earth once a year, to light millions of lamps to dispel the darkness and ignorance, and spread the radiance of love and wisdom.

Fifth Day is Bhai Dooj
Last Day of Diwali is called Bhai Dooj also Known as Yuma Dwitiya. This is the day for brothers and sisters to strengthen their relationships Yamuna.
Prayed for her brother Yam (God of Death), on this day sisters invite their brothers to their homes. Sisters are praying for their Brothers well-being and Tilak them with roli (sin door) or akshat on this day, and brothers give gifts to their sisters in return on this day

Diwali Pujan Muhurat 11 November 2015
Maha Lakshmi Pooja and festival of Diwali is celebrated in Pradosh Kaal of Karitik Krishna Paksha, fixed Lagan time. In order to get the blessings of Goddess of wealth, i.e. Maha Lakshmi Mata, performing Lakshmi Poojan is considered auspicious.

Diwali Muhurat 2015 is a traditional Hindu festival symbolizing the love and affection to all people. This festival is very famous and celebrated to all people. Diwali Muhurat and Pujan Time are very important to every business men.
There are very important to diyas and many group of people especially Gujarati businessmen do Chopda Pujan during Diwali Puja. During Chopda Puja new account books are launch in presence of Mata Lakshmi to look for her blessing for the next financial year.

Diwali Laxmi Pujan Muhurat Time 2015 – 5:42pm to 7:38pm
Diwali Pooja Muhurat of Pradosh Kaal – suitable to 5:25pm to 8:10pm
Diwali Shubh Muhurat of Vrishabha Kaal – suitable to 5:38pm to 7:33pm
Diwali Pujan Time of Simha Kaal – 12:10pm to 2:30pm
Diwali Pujan Time of Mahanishita Kaal – 11:50pm to 12:49am

Choghadiya Muhurat on Lakshmi Puja
Morning Muhurta (Labh, Amrit) = 06:43 – 09:35
Morning Muhurta (Shubh) = 10:44 – 12:10
Afternoon Muhurta (Char, Labh) = 14:46 – 17:50
Evening Muhurta (Shubh, Amrit, Char) = 19:10 – 23:15

Lakshmi Puja Mantra
Diwali – the Festival of light is incomplete without Lakshmi Puja. Chant the given Lakshmi Puja mantra and make your Puja more fruitful. The most important ritual of Diwali is Lakshmi Puja. It is believed that Goddess Laxmi visits everyone during Diwali to bring peace and prosperity to all. Hence, Diwali is the most auspicious day to worshiping Goddess Lakshmi. Traditionally Laxmi Puja or Lakshmi Ganesha Puja is performed after sunset. This Puja is also known as Lakshmi Kuber Puja. Chant the given Lakshmi Puja mantra and make your Puja more fruitful.

1) Lakshmi Beej Mantra
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः।।
Om Hreem Shreem Lakshmibhayo Namah ||

2) Mahalakshmi Mantra
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम: ।।
Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed
Om Shreem Hreem Shreem Mahalakshmaye Namah ||

3) Lakshmi Gayatri Mantra
ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च
धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ ।।
Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi Tanno Lakshmi Prachodayat Om ||

HAPPY DEEPAWALI TO ALL OF YOU…

Pitra-dosha Remedies on Amavasaya Pitra-dosha Remedies on Amavasaya

Pitra-dosha Remedies on Amavasaya

अमावस्या को पितृ दोष उपचार

ज्योतिष में पितृदोष का बहुत महत्व माना जाता है। प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में पितृदोष सबसे बड़ा दोष माना गया है। इससे पीड़ित व्यक्ति का जीवन अत्यंत कष्टमय हो जाता है। जिस जातक की कुंडली में यह दोष होता है उसे धन अभाव से लेकर मानसिक क्लेश तक का सामना करना पड़ता है। पितृदोष से पीड़ित जातक की उन्नति में बाधा रहती है।घर परिवार में नित्यप्रति का कलह क्लेश इन्सान को शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक–इन तीनों पक्ष से पीडित कर उसके प्रगति मार्ग को ही अवरूद्ध कर डालता है। फलस्वरूप जीवन में सिवाए दुखों के कुछ भी हाथ नहीं लगता…..
Pitra-dosha (पितृदोष) मृत्यु के पश्चात संतान अपने पिता का श्राद्ध नहीं करते हैं एवं उनका जीवित अवस्था में अनादर करते हैं तो पुनर्जन्म में उनकी कुण्डली में पितृदोष ( Pitra dosha) लगता है| सर्प हत्या या किसी निरपराध की हत्या से भी यह दोष लगता है.पितृ दोष को अशुभ प्रभाव देने वाला माना जाता है।

पितृ दोष उपचार (Remedies of Pitra Dosha):—

जिनकी कुण्डली में पितृ दोष है उन्हें इसकी शांति और उपचार कराने से लाभ मिलता है. पितृ दोष शमन के लिए नियमित पितृ कर्म करना चाहिए अगर यह संभव नहीं हो तो पितृ पक्ष में श्राद्ध करना चाहिए.
उनके लिए कुछ बेहद सरल, किन्तु पूर्णत: फलदायी उपाय दिए जा रहे हैं. श्रद्धा एवं विश्वास को आधार में रखकर, उनमें से किसी एक या दो उपायों को किया जाए तो निश्चय ही गृ्ह कलह से राहत प्राप्त कर सकेंगें|

**हिंदू धर्म में अमावस्या को पितरों की तिथि माना गया है।सर्वपितृ श्राद्ध भी अमावस्या को पड़ता है। जिन लोगों को अपने पितरों की तारीख़ का नहीं पता वो सब इस दिन श्राद्ध कर सकते है जो लोग श्राद्ध कर चुके है वे भी रस दिन अज्ञात पितरों की शान्ती हेतु श्राद्ध कर सकते है इससे सभी पितरों की शान्ती होगी व उनका आशीर्वाद मिलेगा|

** इसलिए इस दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए गाय के गोबर से बने उपले (कंडे) पर शुद्ध घी व गुड़ मिलाकर धूप (सुलगते हुए कंडे पर रखना) देनी चाहिए। यदि घी व गुड़ उपलब्ध न हो तो खीर से भी धूप दे सकते हैं।
यदि यह भी संभव न हो तो घर में जो भी ताजा भोजन बना हो, उससे भी धूप देने से पितर प्रसन्न हो जाते हैं। धूप देने के बाद हथेली में पानी लें व अंगूठे के माध्यम से उसे धरती पर छोड़ दें। ऐसा करने से पितरों को तृप्ति का अनुभव होता है और वे हमें आशीर्वाद देते हैं। जिससे हमारे जीवन में सुख-शांति आती है।

**अमावस्या पर भूखे प्राणियों को भोजन कराने का भी विशेष महत्व है। इस दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद आटे की गोलियां बनाएं। गोलियां बनाते समय भगवान का नाम लेते रहें। इसके बाद समीप स्थित किसी तालाब या नदी में जाकर यह आटे की गोलियां मछलियों को खिला दें। इस उपाय से आपके जीवन की परेशानियों का अंत हो सकता है।

**अमावस्या पर चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा खिलाएं। ऐसा करने से आपके पाप कर्मों का प्रायश्चित होगा और अच्छे कामों के फल मिलना शुरू होंगे। इसी से आपकी मनोकामनाओं की पूर्ति होगी।

**अमावस्या को पीपल के वृक्ष पर दोपहर में जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काले तिल चढ़ाएं और स्वर्गीय परिजनों का स्मरण कर उनसे आशीर्वाद मांगें। शाम के समय में दीप जलाएं और नाग स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र या रुद्र सूक्त या पितृ स्तोत्र व नवग्रह स्तोत्र का पाठ करें। इससे भी पितृ दोष की शांति होती है।

**अमावस्या को शाम के समय घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक लगाएं। बत्ती में रुई के स्थान पर लाल रंग के धागे का उपयोग करें। साथ ही दीएं में थोड़ी सी केसर भी डाल दें। यह मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का उपाय है।

**अमावस्या व शनिवार के शुभ योग में किसी भी हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। संभव हो तो हनुमानजी को चमेली के तेल से चोला भी चढ़ा सकते हैं। ये उपाय करने से साधक की समस्त मनोकामनाएं पूरी हो सकती।

**अपने स्वर्गीय परिजनों की निर्वाण तिथि पर जरूरतमंदों अथवा गुणी ब्राह्मणों को भोजन कराए। भोजन में मृतात्मा की कम से कम एक पसंद की वस्तु अवश्य बनाएं। इसी दिन अगर हो सके तो अपनी सामर्थ्यानुसार गरीबों को वस्त्र और अन्न आदि दान करने से भी यह दोष मिटता है। नियमित कौओं और कुत्तों का खाना देना चाहिए. पीपल में जल देना चाहिए. ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए. गौ सेवा और गोदान करना चाहिए. विष्णु भगवान की पूजा लाभकारी है। घर के पूजनस्थल में एक शंख अवश्य रखें. नित्य अथवा सप्ताह में कम से कम दो बार ( किसी भी दिन) प्रात: समय शंख में जल भरकर रखें तथा संध्याकाल में उस जल को घर में चारों ओर थोडा थोडा छिडक दें। प्रतिदिन इष्ट देवता व कुल देवता की पूजा करने से भी पितृ दोष का शमन होता है।

**कुंडली में पितृदोष होने से किसी गरीब कन्या का विवाह या उसकी बीमारी में सहायता करने पर भी लाभ मिलता है। ब्राह्मणों को प्रतीकात्मक गोदान, गर्मी में पानी पिलाने के लिए कुंए खुदवाएं या राहगीरों को शीतल जल पिलाने से भी पितृदोष से छुटकारा मिलता है।

**श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करने से भी पित्तरों को शांति मिलती है और दोष में कमी आती है। पारिवारिक मतभेद व गृ्ह-कलेश आदि से मुक्ति मिलती है।

Raksha Bandhan Shubh Muhurat Raksha Bandhan Shubh Muhurat

Raksha Bandhan Shubh Muhurat

भाई-बहन के खूबसूरत रिश्ते की झलक देने वाला त्यौहार रक्षाबंधन हिन्दू धर्म के मुख्य पर्वों में एक है। श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। प्राचीन वृतांतों में राखी की जगह रक्षा सूत्र बांधने की बात कही गई है। भविष्यपुराण में यह लिखा गया है कि देवराज इन्द्र की पत्नी शची ने इन्द्र को रक्षा सूत्र बांधकर उसे अपराजित बना दिया था। मुगल काल में चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर अपना भाई बनाया था। बाद में हुमायूं ने गुजरात के राजा के आक्रमण से चित्तौड़ की रक्षा की थी। मान्यता है कि द्वापर युग में द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लगने पर कपड़ा बांधा जिसके बाद उन्होंने द्रौपदी को बहन मानकर उसकी रक्षा का वादा किया था। इस दिन महाराष्ट्र में नारियल पूजन किया जाता है।

वर्ष 2015 में रक्षा बंधन का त्यौहार 29 अगस्त ,शनिवार को मनाया जाएगा।

इस बार भी रक्षाबंधन पर भद्रा का योग बन रहा है। रक्षाबंधन पर भद्रा होने से दोपहर बाद ही भाइयों की कलाई पर राखी सजेगी। भद्रा काल में राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता। लगातार तीसरे साल रक्षाबंधन पर भद्रा का योग बन रहा है।

पूर्णिमा तिथि 29 अगस्त को सुबह लगभग 4 बजे प्रारंभ होगी, जो रात लगभग 12.05 तक रहेगी। वहीं 28 अगस्त की रात 12 बजे बाद लगभग 2:30 से भद्रा शुरू होगी, जो 29 अगस्त को दोपहर लगभग 13:50 तक रहेगी। वैसे तो भद्रा काल में रक्षाबंधन नहीं करना चाहिए, लेकिन ज्यादा ही जरूरी हो तो निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार, भद्रा के विष्टी पुच्छ काल में रक्षाबंधन किया जा सकता है।

विष्टी पुच्छ काल भद्रा का आखिरी समय होता है, जो कि लगभग साढ़े तीन घंटे का होता है। 29 अगस्त को सुबह लगभग 10:20 बजे से ये समय शुरू होगा और भद्रा खत्म होने तक रहेगा, यानी यानी दोपहर लगभग 1:50 तक। भद्रा में इसलिए नहीं बंधती राखी

ज्योतिष में कुल 11 करण हैं। इनमें 4 स्थिर व 7 चर होते हैं। इनमें भद्रा भी एक करण है, जो शुभ नहीं है। प्रत्येक मास के एक पक्ष में 4 बार भद्रा करण आता है। भद्रा को दरिद्र माना गया है। इसलिए भद्रा काल में विवाह, रक्षाबंधन सहित कोई भी शुभ कार्य नहीं किए जाते।

रक्षाबंधन के शुभ मुहूर्त
अभिजित मुहूर्त

दोपहर 12 बजे से 12:50 बजे तक (जरूरी हो तो)

चौघड़िया मुहूर्त
दोपहर 12:28 बजे से 02:02 बजे तक- चल (जरूरी हो तो)
दोपहर 03:37 बजे से शाम 5:12 बजे तक- अमृत
शाम 6:47 बजे से रात 8:12 बजे तक – लाभ

श्रावण मास रुद्राभिषेक का महत्व श्रावण मास रुद्राभिषेक का महत्व

श्रावण मास रुद्राभिषेक का महत्व

सावन के महीने को शिव आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है. क्योंकि ये महीना देवाधिदेव महादेव को बहुत प्रिय है. सावन का महीना ऐसा महीना है, जिसमें छह ऋतुओं का समावेश होता है. और शिवधाम पर इसका महत्व सबसे ज्यादा होता है. कहा जाता है कि शिव को प्रसन्न करने का सर्वोच्च उपाय रुद्राभिषेक ही है. साक्षात देवी और देवता भी शिव कृपा के लिए शिव-शक्ति के ज्योति स्वरूप का रुद्राभिषेक ही करते हैं.

भारतीय संस्कृति में वेदों का इतना महत्व है तथा इनके ही श्लोकों, सूक्तों से पूजा, यज्ञ, अभिषेक आदि किया जाता है। शिव से ही सब है तथा सब में शिव का वास है, शिव, महादेव, हरि, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, नीलकंठ आदि सब ब्रह्म के पर्यायवाची हैं। रुद्र अर्थात् ‘रुत्’ और रुत् अर्थात् जो दु:खों को नष्ट करे, वही रुद्र है, रुतं–दु:खं, द्रावयति–नाशयति इति रुद्र:। रुद्रहृदयोपनिषद् में लिखा है–

सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।
रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दन:।।
यो रुद्र: स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशन:।
ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्।।

यह श्लोक बताता है कि रूद्र ही ब्रह्मा, विष्णु है सभी देवता रुद्रांश है और सबकुछ रुद्र से ही जन्मा है। इससे यह सिद्ध है कि रुद्र ही ब्रह्म है, वह स्वयम्भू[2] है।[3]
रुद्राभिषेक
रुद्राभिषेक में शिवलिंग की विधिवत् पूजा की जाती है|शिव जी को पूजा में रुद्राभिषेक सर्वाधिक प्रिय है।
रुद्र के पूजन से सब देवताओं की पूजा स्वत:सम्पन्न हो जाती है।
रुद्रहृदयोपनिषद्में लिखा है-सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।

प्राचीनकाल से ही रुद्र की उपासना शुक्लयजुर्वेदीयरुद्राष्टाध्यायी के द्वारा होती आ रही है। इसके साथ रुद्राभिषेक का विधान युगों से वांछाकल्पतरुबना हुआ है। साम्बसदाशिव रुद्राभिषेक से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसीलिए कहा भी गया है-शिव: रुद्राभिषेकप्रिय:।शिव जी को पूजा में रुद्राभिषेक सर्वाधिक प्रिय है।

शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूíत के लिए रुद्राभिषेक के निमित्त अनेक द्रव्यों का निर्देश किया गया है।
जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदकसे रुद्राभिषेक करें।
भवन-वाहन प्राप्त करने की इच्छा से दही ।
लक्ष्मी-प्राप्ति का उद्देश्य होने पर गन्ने के रस से अभिषेक करें।
व्यापार में उतरोत्तर वृद्धि तथा लक्ष्मी प्राप्ति के लिए – गन्ने का रस से रुद्राभिषेक करें।
धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से रुद्राभिषेक करें।
तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
पुत्र की इच्छा करनेवालादूध के द्वारा रुद्राभिषेक करे।
वन्ध्या,काकवन्ध्या(मात्र एक संतान उत्पन्न करनेवाली) अथवा मृतवत्सा(जिसकी संतानें पैदा होते ही मर जायं)गोदुग्धसे अभिषेक करे।
ज्वर की शांति हेतु शीतल जल से रुद्राभिषेक करें।
सहस्रनाम-मंत्रोंका उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
बच्चों के जन्मोत्सव एवं उनके यसस्वी भविष्य के लिए -दुग्ध एवं तीर्थजल से
प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेकसे हो जाती है।
शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
धन की वृद्धि एवं ऋण मुक्ति तथा जन्मपत्रिका में मंगल दोष सम्बन्धी निवारणार्थ – शहद से
शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।
पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।
गोदुग्धसे निíमत शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यताप्राप्त होती है।
पुत्रार्थी शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।
इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंगका विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट निश्चय ही पूर्ण होता है।
रुद्राभिषेक से लाभ ;;
“शिव-भक्तों को यजुर्वेदविहितविधान से रुद्राभिषेक करना चाहिए।”
रुद्राभिषेक से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।अंसभवभी संभव हो जाता है।प्रतिकूल ग्रहस्थिति अथवा अशुभ ग्रहदशा से उत्पन्न होने वाले अरिष्ट का शमन होता है। भगवान शिव चंद्रमा को अपने सिर पर धारण करते हैं । चंद्रमा ज्योतिष मे मन का कारक है । किसी भी प्रकार के मानसिक समस्या को दूर करने मे रुद्रभिषेक सहायक सिद्ध होता है। चंद्रमा को जब क्षय रोग हुआ था तो सप्तऋषि ने रुद्रभिषेक किया था । चंद्रमा के पीड़ित होने से क्षय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। यह ज्योतिषीय नियम है की कुंडली मे अगर चंद्रमा पाप गृह से पीड़ित हो तो क्षय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर कोई इस प्रकार की बीमारी से पीड़ित है तो रुद्राभिषेक करवाना लाभप्रद होता है।
गंभीर किस्म के बीमारियों को दूर करने हेतु एवं उनके होने से बचने हेतु रुद्रभिषेक करवाना लाभप्रद होता है।
रुद्राभिषेक सद्बुद्धि सद्विचार और सत्कर्म की ओर पृवृत्ति होती है |
रुद्राभिषेक से मानव की आत्मशक्ति, ज्ञानशक्ति और मंत्रशक्ति जागृत होती है |

रुद्राभिषेक से मानव जीवन सात्त्विक और मंगलमय बनता है |
रुद्राभिषेक से अंतःकरण की अपवित्रता एवं कुसंस्कारो के निवारण के उपरांत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन पुरुषार्थचतुस्त्य की प्राप्ति होती है |
रुद्राभिषेक से असाध्य कार्य भी साध्य हो जाते हैं, सर्वदा सर्वत्र विजय प्राप्त होती है, अमंगलों का नाश होता है, सत्रु मित्रवत हो जाता है |
रुद्राभिषेक से मानव आरोग्य, विद्या , कीर्ति, पराक्रम, धन-धन्य, पुत्र-पौत्रादि अनेकविध ऐश्वर्यों को सहज ही प्राप्त कर लेता है |
“किंतु असमर्थ व्यक्ति प्रचलित मंत्र-ॐ नम:शिवायको जपते हुए भी रुद्राभिषेक कर सकते हैं।”

Maha Shivaratri Maha Shivaratri

Maha Shivaratri

Maha Shivaratri

Maha Shivaratri (Night of Shiva) is a Hindu festival, celebrated all over the country with great enthusiasm. Maha shivaratri in 2015 will be observed on Tuesday, February 17, 2015

The legend of marriage of Shiva and Shakti is one the most important legends related to the festival of Maha Shivaratri. According to legend of Shiva and Shakti, the day Lord Shiva got married to Parvati is celebrated as Shivaratri – the Night of Lord Shiva. It is said that on this night Parvati prayed fervently for the well-being of Lord Shiva. (Tuesday) Shivaratri is great festival of convergence of Shiva and Shakti. Chaturdashi Tithi during Krishna Paksha in month of Magha is known as Maha Shivaratri according to South Indian calendar. However according to North Indian calendar Masik Shivaratri in month of Phalguna is known as Maha Shivaratri. In both calendars it is naming convention of lunar month which differs. However both, North Indians and South Indians, celebrate Maha Shivaratri on same day. Shivaratri puja can be performed one time or four times during the night. The whole night duration can be divided into four to get four Prahar ( to perform Shiva Puja four times) We also list Nishita time when Lord Shiva appeared on the Earth in the form of Linga and the time window to break the fast on next day.Hindu fasts are strict and people pledge for self-determination and seek God blessing before starting them to finish them successfully.

Maha Shivaratri-Pujan time

Ratri First Prahar Puja Time = 8:10pm to 10:50pm
Ratri Second Prahar Puja Time = 10:52pm to 1:35am at night
Ratri Third Prahar Puja Time = 1:35am to 04:15am
Ratri Fourth Prahar Puja Time = 04:15am to 06:55am

Chaturdashi Tithi Begins = 18:06 on 17/Feb/2015
Chaturdashi Tithi Ends = 14:33 on 18/Feb/2015

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