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Bhrigumantra participated in 34th All India Astrology Summit held in Nabha Bhrigumantra participated in 34th All India Astrology Summit held in Nabha

Bhrigumantra participated in 34th All India Astrology Summit held in Nabha

At 34th All India Astrology Summit held in Nabha, Bhrigumatra team had predicted that Modi-Amit jodi will keep on rolling till 2019 elections. Moreover, under the leadership of Rahul Gandhi, Congress will nurture more than earlier but still will not be in majority before 2024. Even problems of many people were resolved during this summit.

जय शनिदेव

ॐ।
जय शनिदेव

आज शनि अमावस्या है, जब शनिवार के दिन अमावस्या का समय हो तो इसे शनि अमावस्या कहा जाता है. जो शनिदेव की कृपा पाने के लिए विशेष लाभकारी है. इस बार ये अमावस्या विशेष संयोग लेकर आ रही है. इस दिन विशाला नक्षत्र में शोभन योग है. यह योग यदि शनिवार के दिन हो तो इससे उस दिन का, तिथि और नक्षत्र का प्रभाव कई गुना अधिक बढ़ जाता है. इसके पहले शनि अमावस्या पर शोभन योग वर्ष 1987 में बना था. इस दिन पूजा-पाठ करने से आपको शनि की विशेष कृपा मिलेगी।

30 साल बाद शोभन योगआज के दिन का संयोग बन रहा है. यह योग दान-पुण्य से लेकर बाजार से खरीदी व नए कार्यों की शुरुआत के लिए शुभ रहेगा।

ग्रहों की गणना अनुसार वर्तमान में शनि धनु राशि में मार्गी है। इसके साथ ही सवा दो दिन के लिए चंद्र-बुध वृश्चिक राशि में युतिकृत रहेंगे. चूंकि बुध चंद्रमा के पुत्र होने से पिता-पुत्र का वृश्चिक राशि में शनि के साथ होने पर द्वादश: योग निर्मित होगा. चंद्रमा वनस्पति तो बुध व्यापार का सूचक होने से आने वाले समय में फसलों और कारोबार दोनों में वृद्धि करेंगे. वहीं वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल भी कन्या राशि में परिभ्रमण कर रहा है. यह अवस्था भी परस्पर मंगल-बुध का राशि परिवर्तन कहलाती है. इससे नए कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होकर सफलता मिलेआज के दिन मनुष्य को सरसों का तेल, उड़द, काला तिल, देसी चना, कुलथी गुड शनियंत्र, और शनि संबंधी समस्त पूजन सामग्री अपने ऊपर वार कर शनिदेव के चरणों में चढ़ाकर शनिदेव का तैलाभिषेक करना चाहिए।

शनि अमावस्य के दिन श्री शनिदेव की आराधना करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होंती हैं. कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी अनेक बाधाओं से मुक्ति पाने का यह दुर्लभ समय होता है जब शनिवार के दिन अमावस्या का समय हो जिस कारण इसे शनि अमावस्या कहा जाता है।

शनि अमावस्या पितृदोष से मुक्ति दिलाए

अमावस्या का विशेष महत्व है और अमावस्या अगर शनिवार के दिन पड़े तो इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है. शनिदेव को अमावस्या अधिक प्रिय है. शनि देव की कृपा का पात्र बनने के लिए शनिश्चरी अमावस्या को सभी को विधिवत आराधना करनी चाहिए. भविष्यपुराण के अनुसार शनिश्चरी अमावस्या शनिदेव को अधिक प्रिय रहती है।

शनैश्चरी अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए. जिन व्यक्तियों की कुण्डली में पितृदोष या जो भी कोई पितृ दोष की पिडा़ को भोग रहे होते हैं उन्हें इस दिन दान इत्यादि विशेष कर्म करने चाहिए. यदि पितरों का प्रकोप न हो तो भी इस दिन किया गया श्राद्ध आने वाले समय में मनुष्य को हर क्षेत्र में सफलता प्रदान करता है, क्योंकि शनिदेव की अनुकंपा से पितरों का उद्धार बडी सहजता से हो जाता है।

शनि अमावस्या पूजन ।

पवित्र नदी के जल से या नदी में स्नान कर शनि देव का आवाहन और दर्शन करना चाहिए. शनिदेव का पर नीले पुष्प, बेल पत्र, अक्षत अर्पण करें. शनिदेव को प्रसन्न करने हेतु शनि मंत्र “ॐ शं शनैश्चराय नम:”, अथवा “ॐ प्रां प्रीं प्रौं शं शनैश्चराय नम:” मंत्र का जाप करना चाहिए. इस दिन सरसों के तेल, उडद, काले तिल, कुलथी, गुड शनियंत्र और शनि संबंधी समस्त पूजन सामग्री को शनिदेव पर अर्पित करना चाहिए और शनि देव का तैलाभिषेक करना चाहिए. शनि अमावस्या के दिन शनि चालीसा, हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ अवश्य करना चाहिए. BM.com

जिनकी कुंडली या राशि पर शनि की साढ़ेसाती व ढैया का प्रभाव हो उन्हें शनि अमावस्या के दिन पर शनिदेव का विधिवत पूजन करना चाहिए।www.bhrigumantra.com

इस दिन महाराज दशरथ द्वारा लिखा गया शनि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और उनके पास समय की कमी है वह सफर में शनि नवाक्षरी मंत्र अथव
“कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम:। सौरी..
“कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम:। सौरी: शनिश्चरो मंद:पिप्पलादेन संस्तुत:।।”मंत्र का जप करने का प्रयास करते हैं करें तो शनि देव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
जय शनिदेव

शुभ धनतेरस 2017 शुभ धनतेरस 2017

शुभ धनतेरस 2017

इस साल 17 अक्टूबर को धनतेरस का त्योहार मनाया जाएगा । धनतेरस के दिन ना केवल अपार धन-संपदा पाई जा सकती है बल्कि आप सेहत और सौभाग्य का वरदान भी पा सकते हैं । कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी पर जब ग्रहों और नक्षत्रों का अद्धुत संयोग बनता है, तब होती है धनतेरस की पूजा। इससे प्रसन्न होते हैं कुबेर और धन-संपत्ति और वैभव का वरदान देते हैं। ये वो पूजा है जिससे देवताओं के वैद्य धनवंतरि आरोग्य का सुख प्रदान करते हैं और अकाल मृत्यु के भय का नाश करते हैं ।

पुराणों में धनतेरस की पूजा को बेहद कल्याणकारी बताया गया है । इसे धन त्रियोदशी भी कहते हैं ।

कैसे करें पूजन
धनतेरस कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन यानी दिवाली दो दिन पहले मनाया जाता है । इस दिन सबसे पहले तेल लगाकर नहाएं और फिर लाल या गुलाबी कपड़े पहनें । पूजन में सबसे पहले गणेश-लक्ष्मी जी और कुबेर की पूजा करें । गणेश जी सारी बाधाएं दूर करेंगे, लक्ष्मी जी धन लाभ देंगी और कुबेर पैसे की बचत कराएंगे । इस तरह घर में बरकत आएगी । कुबेर को कमल का फूल, गुलाब की माला नारियल, बर्फी, केले और मखाने का भोग लगाएं। गुग्गल की धूप जलाएं और घी का दीपक जलाएं । फिर इस मंत्र का जाप करें : ॐ गणपति देवाय नमः, ॐ श्रिये नमः, ॐ कुबेराय नमः ।

धनतेरस को होती है धनवंतरि जयंती

मान्यता है कि धनवंतरि देव समुद्र मंथन से निकले थे । वह आरोग्य, आयु, धन और सुख देते हैं। धनवंतरि देव विघ्न विनाशक भी हैं। इन्हें गेंदे के फूल की माला चढ़ाएं, चंदन लगाएं । दूध, दही, शक्कर, शहद और घी मिलाकर पंचामृत बनाएं । पंचामृत को धनवंतरि देव को चढ़ाएं । सेब और बर्फी, पैसे चढ़ाएं और घी के दीपक से आरती करें । इसके बाद ॐ धन्वन्तरये नमः मंत्र का जाप करें ।

धनतेरस वाले दिन खरीदारी करने का शुभ मुहूर्त:  शाम 07:16 बजे से 08:18 बजे तक का है ।

इन चीजों को खरीदने पर मिलेगा लाभ
इस साल धनतेरस मंगलवार को पड़ा है। इसलिए धातु में सोना और तांबे की चीज की खरीदारी फायदेमंद रहेगी। मकान और जमीन खरीदने के लिए भी ये दिन शुभ माना जाता है । अन्य चीज खरीदने पर आप को दिक्कत होगी ।

कैसे करें दीपदान
धनतेरस पर दीपदान का भी विशेष महत्व होता है । शाम को दीपदान जरूर करें । घर के मुख्य द्वार पर तिल के तेल का चारमुखी दीपक जलाएं । थाली में यमराज के लिए सफेद बर्फी, तिल की रेवड़ी या तिल मुरमुरे के लडडू, एक केला और एक गिलास पानी रखें ।

सिंदूर या हल्दी में गाय का शुद्ध घी या चमेली का तेल एवं इत्र मिला कर घर के मुख्य द्वार पर लाभ चौगडिया में श्रद्धा पूर्वक हरी नाम का जाप करते हुए स्वास्तिक, ॐ, शुभ, लाभ, रिद्धि, सिद्धि, आदि जरुर लिखें।

श्रीयन्त्र की स्थापना एक नवीन कमलगट्टे की माला पर करें और अगर हो सके तो नित्यप्रति श्रीयन्त्र पर नागकेशर जरुर चढ़ाएं कमलगट्टे पर स्थापित श्रीयन्त्र पर नागकेशर चढाने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है ।

चिर स्थाई लक्ष्मी प्राप्ति के लिए धनतेरस से दीपावली तक भगवान् कुबेर का पूजन अवश्य ही करें ।

Dussehra- A day to celebrate the victory of good over evil Dussehra- A day to celebrate the victory of good over evil

Dussehra- A day to celebrate the victory of good over evil

Dusshera also known as Vijayadashmi and is one of the main festival of Hindus. The 10th day after Navratri is called Dussehra, on which number of fairs is organized throughout northern India, burning effigies of Ravana), his son and brother( Meghnadh and Kumbhakarna) are set to fire. In the eastern parts of the country, Vijayadashmi marks the end of Durga Puja. In other parts of the country, the day is celebrated to remember Lord Ram’s victory over Ravana, to mark the triumph of good over evil, and is known as Dussehra . The Ram Lila an enactment of the life of Lord Rama is held during the nine days preceding Dussehra. The word Dussehra comes from the word DUS meaning “Ten” and HARA meaning “annihilated”. So Dusshera is the day in which the ten facts of evil were destroyed. Each festival that is celebrated in India has its own importance; Dussehra is also one of them. This festival is celebrated in every nook and corner of India with full zeal and enthusiasm.

Vijaya Dashami is celebrated on Ashweyuja sukla Paksha Dashami. This celebration starts from Navratri and ends with the tenth day festival of “Dussehra”. Navratri and Dussehra is celebrated throughout the country at the same time, with varying rituals, but with great enthusiasm and energy as it marks the end of scorching summer and the start of winter season. This year Vijaya Dashami is celebrated on Saturday the 30th, September 2017. The Dashami Tithi will begin from 23:50 pm on 29th September 2017 and it will end at 1:36 am on 1st October 2017.

It is a celebration of victory of good over evil. This day is known as Vijaya Dashami because it is on Vijaya Dashami that Rama Killed Ravana. Who had abducted goddess Sita to his kingdom of Lanka.Lord Rama was a great believer in the powers of goddess Durga, and he prayed to her for nine days before he himself entered the battle on the tenth day. It also believed that Ravan had ten faces they are probably symbol of ten evils. Hence on Vijaya Dashami it is also a custom to worship vehicles, instruments, machines etc. Every instrument or machine of the factory is worshipped and kept idle for the day. Puranas also opined that on this day warrior Goddess Durga defeated and killed the buffalo demon Mahishasura.

Dussehra is one of the most auspicious dates of the year. It is an Abhuj Muhurta. This year it comes with Ravi yoga and Sarvarth siddhi yoga. Taking up new projects and inaugurating any business is considered auspicious on this day. Purchasing any new vehicle, electronic item, gold and clothes on this day is also considered auspicious.Hence lot of people would start any new business or venture on Vijay Dashami.

Vijaya Dashami is one of the biggest festivals that are celebrated in India and it is a national holiday on Vijaya Dashami. In burning the effigies the people are asked to burn the evil within them, and thus follow the path of truth and goodness, bearing in mind the instance of Ravana, who despite all his might and majesty was destroyed for his evil ways. Dussehra is a symbol of sacrificing all the evil deeds, anger, ego, violence etc. People achieve happiness in all spheres of life by worshiping on this day.

May this Dussehra burn all your worries with Ravana and bring you and your family loads of happiness.

On the happy occasion of Dussehra, we pray that Lord Ram fills your life with lots of happiness, prosperity and success. Happy Dussehra 2017!

महासंयोग लेकर आ रहा है इस बार नवरात्रि का पर्व महासंयोग लेकर आ रहा है इस बार नवरात्रि का पर्व

महासंयोग लेकर आ रहा है इस बार नवरात्रि का पर्व

शारदीय नवरात्र शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पर्व 21 सितम्बर से शुरू होकर 29 सितम्बर को समाप्त होगा। नवरात्र के पहले दिन (कलश )घटस्थापना की जाती है इसके बाद लगातार नौ दिनों तक माता की भक्ति में पूजा और उपवास किया जाता है और अष्टमी और नवमी में कन्या पूजा की जाती है। वैसे नवरात्र के प्रारंभ से ही अच्छा वक्त शुरू हो जाता है | इसलिए अगर जातक शुभ मुहूर्त में घट स्थापना नहीं कर पाता है तो वो पूरे दिन किसी भी वक्त कलश स्थापित कर सकता है | इस बार नवरात्र का शुभ मुहूर्त गुरुवार के दिन हस्त नक्षत्र में घट स्थापना के साथ शक्ति उपासना का पर्व काल शुरु होगा सुबह 6 बजे से 8 बजकर 25 मिनट तक रहेगा। । अभिजीत मुर्हूत 11.36 से 12.24 बजे तक है। गुरुवार के दिन हस्त नक्षत्र में यदि देवी आराधना का पर्व शुरू हो, तो यह देवीकृपा व इष्ट साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

पहले दिन 21 सितंबर से सुबह मां के शैलपुत्री के रूप का पूजा की जाती है। इस बार मां दुर्गा का आगमन पालकी से होगा व गमन पालकी पर ही होगा, जो अति शुभ है। देवीपुराण में नवरात्रि में भगवती के आगमन व प्रस्थान के लिए वार अनुसार वाहन बताये इस बार माता का आगमन व गमन जनजीवन के लिए हर प्रकार की सिद्धि देने वाला है।
देवी भागवत में नवरात्रि के प्रारंभ व समापन के वार अनुसार माताजी के आगमन प्रस्थान के वाहन इस बताए गए हैं।

आगमन वाहन

रविवार व सोमवार को हाथी

शनिवार व मंगलवार को घोड़ा

गुरुवार व शुक्रवार को पालकी

बुधवार को नौका आगमन

प्रस्थान वाहन

रविवार व सोमवार भैंसा

शनिवार और मंगलवार को सिंह

बुधवार व शुक्रवार को गज हाथी

गुरुवार को नर वाहन पर प्रस्थान

सर्वार्थसिद्धि योग में मनेगा दशहरा

 

21 सितम्बर घटस्थापना, गुरुवार, हस्त नक्षत्र योग – (मां शैलपुत्री की पूजा) |

22 सितम्बर द्वितीया, रवियोग – (मां ब्रह्मचारिणी की पूजा) |

23 सितम्बर तृतीया, रवियोग,सर्वार्थसिद्धि – (मां चन्द्रघंटा की पूजा) |

24 सितम्बर चतुर्थी, रवियोग- (मां कूष्मांडा की पूजा) |

25 सितम्बर चतुर्थी, रवियोग, सर्वार्थसिद्धि – (मां स्कंदमाता की पूजा) |

26 सितम्बर षष्ठी, रवियोग – (मां कात्यायनी की पूजा) |

27 सितम्बर सप्तमी,रवियोग – (मां कालरात्रि की पूजा) |

28 सितम्बर दुर्गाअष्टमी महापूजा – (मां महागौरी की पूजा) |

29 सितम्बर महानवमी रवियोग – (मां सिद्धदात्री की पूजा) |

30 सितम्बर विजयादशमी, रवियोग, सर्वार्थसिद्धि योग

Diwali Pujan Muhurat 30 October 2016 Diwali Pujan Muhurat 30 October 2016

Diwali Pujan Muhurat 30 October 2016

Maha Lakshmi Pooja and festival of Diwali is celebrated in Pradosh Kaal of Karitik Krishna Paksha, fixed Lagan time. In order to get the blessings of Goddess of wealth, i.e. Maha Lakshmi Mata, performing Lakshmi Poojan is considered auspicious. As Goddess Lakshmi is movable and never stays at a single place for long, there are always attempts to make her fixed or prolong her stay at one place by worshiping her during a fixed Lagna. It is believed that worshipping Goddess Lakshmi during fixed Lagna would make her stable or at least prolong her stay at one place.

Most of the religious books Dharma Sindhu, Nirnaya Sindhu and Vratraj suggest Lakshmi Puja on Diwali during Pradosh time after sunset while Amavasya Tithi prevails. If Amavasya Tithi is getting over before sunset then Lakshmi Puja is done on Chaturdashi Tithi when Amavasya prevails after sunset. As most of these religious books don’t mention Muhurat for Puja timings based on Vedic astrology, many astrologers provide various auspicious Puja timings for Lakshmi Puja on Diwali. Although there are various opinions on the best Muhurat for Lakshmi-Ganesha Puja on Diwali, the most astrologers agree that Lakshmi Puja should be done during fixed Lagna.

Diwali Muhurat 2016 is a traditional Hindu festival symbolizing the love and affection to all people. This festival is very famous and celebrated to all people. Diwali Muhurat and Pujan Time are very important to every business men.

There are very important to diyas and many group of people especially Gujarati businessmen do Chopda Pujan during Diwali Puja. During Chopda Puja new account books are launch in presence of Mata Lakshmi to look for her blessing for the next financial year. The Lagna is most significant factor while considering the Muhurat for most activities. The following four Lagna(s) are considered fixed in nature and are considered good for Lakshmi Puja.

Amavasya Tithi Begins = 20:40 on 29October2016

Amavasya Tithi Ends = 23:10 on 30October2016

 

Diwali Laxmi Pujan Muhurat Time 20166:25pm to 8:07pm

Duration = 1Hours 42 Mins

Diwali Pooja Muhurat of Kumbha Lagna = suitable to 14:15 to 15:23 (afternoon

Diwali Pooja Muhurat of Pradosh Kaal – suitable to 5:35pm to 8:20pm

Diwali Shubh Muhurat of Vrishabha Kaal – suitable to 6:25pm to 8:22pm

Diwali Pujan Time of Simha Kaal – 12:54pm to 3:10am

Diwali Pujan Time of Mahanishita Kaal – 11:55pm to 04:45am

 

Choghadiya Muhurat on Lakshmi Puja

Morning Muhurta (Labh, Amrit) = 06:40 – 09:15

Morning Muhurta (Shubh) = 10:44 – 12:10

Afternoon Muhurta (Char, Labh) = 13:26 – 14:50

Evening Muhurta (Shubh, Amrit, Char) = 18:20 – 20:15

 

Lakshmi Puja Mantra

Diwali – the Festival of light is incomplete without Lakshmi Puja. Chant the given Lakshmi Puja mantra and make your Puja more fruitful. The most important ritual of Diwali is Lakshmi Puja. It is believed that Goddess Laxmi visits everyone during Diwali to bring peace and prosperity to all. Hence, Diwali is the most auspicious day to worshiping Goddess Lakshmi. Traditionally Laxmi Puja or Lakshmi Ganesha Puja is performed after sunset. This Puja is also known as Lakshmi Kuber Puja. Chant the given Lakshmi Puja mantra and make your Puja more fruitful.

 

1) Lakshmi Beej Mantra

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः।।

Om Hreem Shreem Lakshmibhayo Namah ||

 

2) Mahalakshmi Mantra

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम: ।।

Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed

Om Shreem Hreem Shreem Mahalakshmaye Namah ||diwali pujan mahurat - bhrigumantra

 

3) Lakshmi Gayatri Mantra

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च

धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ ।।

Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi Tanno Lakshmi Prachodayat Om ||

 

HAPPY DEEPAWALI TO ALL OF YOU…

Significance of Karwa Chauth Fast Significance of Karwa Chauth Fast

Significance of Karwa Chauth Fast

Karwa Chauth is a celebration which is seen by Hindu ladies for the long-life of their spouses. This celebration is celebrated with extraordinary energy and force and the whole nation sets up in the festive mood in spite of the regional variations. Praised only nine days earlier Diwali, the celebration falls on the fourth month of Karthik according to the Hindu timetable. In the name Karwa Chauth, “Karwa” implies an earthen pot with a gush and “Chauth” implies fourth. Despite the fact that celebrated with ceremony, Karwa Chauth really implies the solid will of a lady, who stays without taking nourishment or water for a whole day, for the long-existence of her better half. This celebration fortifies the adoration between wedded couples. Karwa Chauth pujas are directed around the same time, where Karwa Chauth legends are described to a gathering of ladies by a “pujarin” or elderly ladies. Among every one of the customs, the most important part of Karwa Chauth is, without a doubt, the quick. Scroll further and discover additionally fascinating realities about the Karwa Chauth Fast.

Significance

As indicated by the Hindu religion, people take a stab at self-acknowledgment and work towards the accomplishment of God in every one of their strolls of life. During one get joined to God and get edified. Consequently, this gets to be flawless time to appeal to God for the wellbeing, thriving and prosperity of their significant other amid this time. Fasting amid the day helps in building up discretion and core interest. It is thought to be the ideal method for poise. Fasting teaches in you a feeling of committed love as well as, self-restraint. It is a sort of preparing given to the body and brain to withstand all hardships and make you sufficiently solid to hold on under extraordinary troubles.

 

Rituals

Married women start their fast from sunrise and stays without consuming food and water until moon rise. They set themselves up for the Fast by eating a pre-day break meal i.e. SARGI. After she has had sargi, ladies don’t eat or drink anything for whatever remains of the day. The mornings are normally enjoyed group social events, putting henna (Mehandi) on hand and feet and so forth. In the evening, they take bath, get arranged in full make-up and well dressed and get together with the group ladies to take an interest in the ceremony. They do puja with lots of preparations, hear Karwa Chauth katha, sing songs so on. Karwa Chauth katha plays very important role in karwa chauth Fast because In this Katha, We get to know the importance of karwa chauth and why it had been started some years ago. For all the Ritual and Origin of Karwa Chauth Katha. Read more:-

 

Some Tips To Follow While Fasting:

Don’t over eat at the time of opening the fast at night. Drink lots of water and eat healthy before you begin your fast.

It is not advisable to fast if you are put under any medication related to health problems.

Don’t indulge in any sort of exercise during your fast. It will make your body weak.

The above write-up is a complete guide to Karwa Chauth fast. Now, prepare yourself for Karwa Chauth fast and be part of this festival.

Sharad Purnima 2016 Sharad Purnima 2016

Sharad Purnima 2016

शरद पूर्णिमा ( कोजागिरी) :
*15 अक्टूबर 2016 – शरद पूनम की रात दिलाये- आत्मशांति, स्वास्थ्यलाभ।*
आश्विन पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ या कोजागिरी भी बोलते हैं । इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था । अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है । इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है ।

*शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?*
दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें ।
अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना ।
*इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से भी नेत्रज्योति बढ़ती है ।*
*शरद पूनम दमे की बीमारीवालों के लिए वरदान का दिन है।*
छोटी इलाईची को, चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं । दमे का दम निकल जायेगा ।
चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है । शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है।

अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में नयापन आता है।
*खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद*
खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे।
खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धो-धा के खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा।
इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे ।
रात्रि 8 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 11 बजे के आसपास भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना और खाने से पहले एकाध चम्मच ईश्वर के हवाले भी कर देना । मुँह अपना खोलना और भाव करना : ‘लो प्रभु ! आप भी लगाओ भोग ।’ और थोड़ी बच जाय तो फ्रिज में रख देना । सुबह गर्म करके खा सकते हो ।

(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी – इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती ।)
*शरद पूनम का आत्मकल्याणकारी संदेश*
रासलीला इन्द्रियों और मन में विचरण करनेवालों के लिए अत्यंत उपयोगी है लेकिन राग, ताल, भजन का फल है भगवान में विश्रांति । रासलीला के बाद गोपियों को भी भगवान ने विश्रांति में पहुँचाया था । श्रीकृष्ण भी इसी विश्रांति में तृप्त रहने की कला जानते थे । संतुष्टि और तृप्ति सभीकी माँग है । चन्द्रमा की चाँदनी में खीर पड़ी-पड़ी पुष्ट हो और आप परमात्म-चाँदनी में विश्रांति पाओ ।

चन्द्रमा के दर्शन करते जाना और भावना करना कि ‘चन्द्रमा के रूप में साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा की रसमय, पुष्टिदायक रश्मियाँ आ रही हैं । हम उसमें विश्रांति पा रहे हैं । पावन हो रहा है मन, पुष्ट हो रहा है तन, ॐ शांति… ॐ आनंद…’ पहले होंठों से, फिर हृदय से जप और शांति… निःसंकल्प ईश्वर में विश्रांति पाते जाना । परमात्म-विश्रांति, परमात्म-ज्ञान के बिना भौतिक सुख-सुविधाएँ कितनी भी मिल जायें लेकिन जीवात्मा की प्यास नहीं बुझेगी, तपन नहीं मिटेगी ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ । (रामायण)

Sarv Pitra Amavasya ke Upay Sarv Pitra Amavasya ke Upay

Sarv Pitra Amavasya ke Upay

सर्वपितृ अमावस्या पर उपाय

आत्मा की अमरता के सिद्धांत को स्वयं भगवान श्रीकृषण गीता में वर्णन करते हैं! आत्मा जबतक अपने परमात्मा से संयोग नहीं कर लेती तब तक विभिन्न संभवत: 84 लाख योनियों में भटकती रहती है और इस मध्य उसे श्राद्ध कर्म से संतुष्टि मिलती है! श्राद्ध – श्रद्धा का दूसरा नाम है ! श्राद्ध कर्म के विषय में अपस्तंब ऋषि कहते हैं कि जैसे यज्ञ – हवन – होम के माध्यम से देवताओं को उनका भाग और शक्ति प्राप्त होती है, उसी प्रकार श्राद्ध और तर्पण से पितृ लोक में बेठे पितरों को उनका अंश प्राप्त होता है! “समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।”
“सर्व पितृ अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं।

अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि पितृजनों के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं इस कार्य में प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्ही पितरों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करने का अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिए विद्वान को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
हिन्दू पंचांग के आश्विन माह के कृष्णपक्ष यानि श्राद्धपक्ष में पितरों की प्रसन्नता के लिए अंतिम अवसर सर्वपितृ अमावस्या माना जाता है। यह तिथि इस बार “30-9-2016” को आएगी। कोई श्राद्ध का अधिकारी पितृपक्ष की सभी तिथियों पर पितरों का श्राद्ध या तर्पण चूक जाएं या पितरों की तिथि याद न हो तब इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। इसलिए यह पितृमोक्ष अमावस्या या सर्वपितृ अमावस्या के नाम से प्रसिद्ध है।
जिन दंपत्तियों के यहां ३ पुत्रियों के बाद एक पुत्र जन्म लेता है या जुड़वां संतान पैदा होती है। उनको सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध जरुर करना चाहिए।
सर्वपित् अमावस्या को पितरों के श्राद्ध से सौभाग्य और स्वास्थ्य प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस तिथि पर पितृ आत्मा अपने परिजनों के पास वायु रुप में ब्राह्मणों के साथ आते हैं। उनकी संतुष्टि पर पितर भी प्रसन्न होते हैं। परिजनों के श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से वह तृप्त और प्रसन्न होकर आशीर्वाद देकर जाते हैं, किंतु उनकी उपेक्षा से दु:खी होने पर श्राद्धकर्ता का जीवन भी कष्टों से बाधित होता है।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों की तृप्ति से परिवार में खुशियां लाने का श्राद्धपक्ष का अंतिम अवसर न चूक जाएं। इसलिए यहां बताए जा रहे हैं कुछ उपाय जिनका अपनाने से भी आप पितरों की तृप्ति कर सकते हैं-
कुंडली में चल रहे कालसर्प दोष से मुक्ति भी इन उपायों द्वारा संभव है कालसर्प दोष की मुक्ति के लिए भी इन उपायों को कर सकते हैं.
सर्वपितृ अमावस्या को पीपल के पेड़ के नीचे पुड़ी, आलू व इमरती या काला गुलाब जामुन रखें।
पेड़ के नीचे धूप-दीप जलाएं व अपने कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करें। पितरों का ध्यान कर नमस्कार करें। ऐसा करने पर आप जीवन में खुशियां व अनपेक्षित बदलाव जरुर देखेंगे।
इस दिन पांच फल गाय को खिलाएं।
पितरों के निमित्त धूप देकर इस दिन तैयार भोजन में से पांच ग्रास गाय, कुत्ता, कौवा, देवता और चींटी या मछली के लिए जरुर निकालें और खिलाएं।
यथाशक्ति ब्राह्मण को भोजन कराएं। वस्त्र, दक्षिणा दें। जब ब्राह्मण जाने लगे तो उनके चरण छुएं, आशीर्वाद लें और उनके पीछे आठ कदम चलें।

अगर श्राद्ध करने वाले की साधारण आय हो तो वह पितरों के श्राद्ध में केवल एक ब्राह्मण को भोजन कराए या भोजन सामग्री जिसमें आटा, फल, गुड़, शक्कर, सब्जी और दक्षिणा दान करें। इससे पितृ दोष का प्रभाव कम होता है।

ब्राह्मण के भोजन के लिए आने से पहले धूपबत्ती अवश्य जलाएं। विद्वान ब्राह्मण को एक मुट्ठी काले तिल दान करने मात्र से भी पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।

इतना भी संभव न हो तो सूर्यदेव को हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि मैं श्राद्ध के लिए जरूरी धन और साधन न होने से पितरों का श्राद्ध करने में असमर्थ हूं। इसलिए आप मेरे पितरों तक मेरा भावनाओं और प्रेम से भरा प्रणाम पहुंचाएं और उन्हें तृप्त करें।

सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें, उसके बाद सूर्य भगवान के सामने जल और अन्न ले जाकर प्रार्थना करें कि:
” हे सूर्यदेव, यमराज आप के पुत्र हैं, हमारे घर के जो भी गुजर गये उन सभी पित्र स्वरूप देव की आत्मा को शांति प्रदान करें, आज किए गए श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ का पुण्य हमारे पित्र देव को प्रदान करें ” इस प्रकार कहते हुए तीन बार जल में काले तिल मिलाकर सूर्य देव के सामने मुंह कर कर तीन बार तिलांजलि अर्पित करें.
पितृ गण इस उपाय से राजी होंगे, और पितरों के आशीर्वाद से परिवार में अच्छी संतान जन्म लेगी, घर में आने वाली अनचाही परेशानियों से मुक्ति मिलेगी , कामकाज एवं धन-समृद्धि में वृद्धि होगी,
इस तरह सर्वपितृ अमावस्या को श्रद्धा से पूर्वजों का ध्यान, पूजा-पाठ, तर्पण कर पितृदोष और कालसर्प दोष के कारण आने वाले कष्ट और दुर्भाग्य को दूर करें। इस दिन को पितरों की प्रसन्नता से वरदान बनाकर मंगलमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

Ekadashi Vrat 2016 Ekadashi Vrat 2016

Ekadashi Vrat 2016

निर्जला एकादशी व्रत – (16 जून 2016- गुरुवार) Ekadashi Vrat

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है। इस एकादशी को भीम एकादशी भी कहा जाता है। जल का सेवन किए बिना उपवास करने से इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस व्रत मे पानी का पीना वर्जित है, इसिलिये इसे निर्जला एकादशी कहते है। इस दिन सुबह से शाम तक दान-पुण्य का दौर चलता है। निर्जला एकादशी के मौके पर लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर सहित शहर के सभी मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान होते है। तथा निर्जला एकादशी पर धर्मार्थियों द्वारा जगह-जगह सेवा शिविर लगाये जाते है, जिसमें शीतल पेयजल, छाछ, फल आदि से लोगों को मनुहार करते है। इस दिन ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करके गौदान, वस्त्रदान, छत्र, फल आदि दान करना चाहिए। इस दिन शक्कर युक्त जल का घडा भर कर आम, खरबूजा के साथ बीजणी मंदिर में रखने या ब्राह्मण को दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी करने का समय :-

निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के दौरान किया जाता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मई अथवा जून के महीने में होता है। साधारणतः निर्जला एकादशी का व्रत गँगा दशहरा के अगले दिन पड़ता है, परन्तु कभी-कभी साल में गँगा दशहरा और निर्जला एकादशी दोनों एक ही दिन पड़ जाते हैं।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारणा कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारणा किया जाता है। एकादशी व्रत का पारणा द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारणा सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारणा न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारणा हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं, उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारणा करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मध्यान के बाद पारणा करना चाहिए।

कभी-कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है, तब स्मार्थ-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उंगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें। इस दिन यथाशक्ति दान करना चाहिए। किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि कदापि ग्रहण न करें। दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है। वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए। त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें। प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणा देना चाहिए।

निर्जला एकादशी से लाभ :-

जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है। उन्हें केवल निर्जला एकादशी का उपवास करना चाहिए, क्योंकि निर्जला एकादशी का उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।

निर्जला एकादशी से सम्बन्धित पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी और भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में दूसरा भाई भीमसेन खाने-पीने का अत्यधिक शौक़ीन था और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं था इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाता था। भीम के अलावा बाकि पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान था। भीमसेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहा है। इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गया, तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने की सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। जो मनुष्य़ निर्जला एकादशी का व्रत करता है उनको मृत्यु के समय मानसिक और शारीरिक कष्ट नही होता है। इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति स्नान, तप और दान करता है, उसे करोड़ों गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है।

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